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संस्कृति

वारकरी और अभंग

पंढरपुर तक चलना, और संतों के अभंग गाते जाना।

कब आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी की ओर बढ़ती पालकियाँ।
क्षेत्र महाराष्ट्र

वारी पैदल तीर्थ है। ज्ञानेश्वर और तुकाराम की पालकियाँ गाँव-गाँव से निकलती हैं। अभंग मराठी भक्ति का गाया हुआ रूप है। इसे केवल संगीत समारोह न समझें। चलने वाले किसान, व्यापारी और विद्यार्थी एक ही धूल में होते हैं।

गणेशोत्सव महाराष्ट्र की दूसरी सार्वजनिक संस्कृति है। दोनों को एक न करें। वारी समानता और श्रम की परंपरा है। जो चल नहीं सकते, वे अभंग सुनकर भी इस धारा में हैं।

यह सामान्य परिचय है। क्रम, सामग्री और मुहूर्त कुल, क्षेत्र और शाखा के अनुसार बदलते हैं। अपने पुरोहित और अपनी रीति को अंतिम मानें।

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